Wednesday, March 11, 2009

सजीव पत्रकारिता के पर्याय हैं श्रीकांत की रचनायें

वर्ष 2007-08 के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किये गये श्रीकांत

आंख़ों मे हाशिये के वाशिंदो का दर्द और मन में सचबयानी करने का जज्बा रख़ने वाले श्रीकांत वर्तमान में पत्रकारिता जगत में बिहार के हस्ताक्षर स्वरूप हैं। वर्ष 2007-08 के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के सर्वोच्च सम्मान से श्रीकांत को सम्मानित कर उनके द्वारा लिख़े यथार्थ को सम्मानित किया गया है। इससे पूर्व इस सम्मान से देश के जाने माने पत्रकार राज किशोर, भरत डोगरा और मंगलेश डबराल को सम्मानित किया गया था।
संपूर्ण क्रांति के गर्भ से वर्तमान के अनेक चर्चित हस्तियों के जन्म होने के साथ-साथ समाज के कमजोर वर्गों में एक नयी चेतना का संचार भी हुआ था। तत्कालीन वास्तविकता यह थी कि पिछड़े वर्ग के संघर्ष की समग्र ब्याख़्या लोगों के समक्ष नहीं आ रही थी। उस समय की विषम परिस्थितियों में शोषितों और पीड़ितों की बात ख़ुले मंच पर रख़ना सहज न था। श्रीकांत ने अपनी रचनाओं में जे0 पी0 आंदोलन की गूंज से लेकर उसके समुद्र मंथन के बाद निकले विष को शब्दों के माध्यम से आम लोगों को परिचित कराया।
सच बोलना और लिख़ना श्रीकांत की विशेषता रही है और इसी कारण इनकी रचनाओं का एक मात्र उद्देश्य रहा है – हाशिये के संघर्ष को जीवित रख़ना। इन्होंने अबतक पांच किताबें लिख़ी हैं। सबसे पहली पुस्तक वर्ष 1995 में प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था “बिहार में चुनाव”। इस पुस्तक में इन्होने लोकतंत्र के महापर्व में हाशिये के वाशिंदों द्वरा दी गयी आहूतियों का विस्तार से वर्णन किया। राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण के ख़िलाफ़ इनकी लेख़नि की तीक्ष्णता अनुकरणीय है। दूसरी पुस्तक “बिहार में समाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम” में इन्होने प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रसन्न कुमार चौधरी के साथ मिलकर करीब 100 वर्षों कें दलितों और पिछड़ों के संघर्ष को एक नये सिरे से प्रस्तुत किया। “स्वर्ग पर धावा : बिहार में दलित आंदोलन” में श्रीकांत ने उपेक्षित वर्ग के दर्द एवं उनके संघर्ष को सजीव किया। अभी हाल ही मे इनकी नयी पुस्तक प्रकाशित हुई है – “ बिहार में परिसीमन”। इस पुस्तक में परिसीमन आयोग द्वारा किये गये परिसीमन से नये एवं परिवर्तित संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों पर चतुष्कोणीय विवरण अर्थात सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक विवरण किया गया है।
प्रांरंभिक वर्षों में नक्सली आंदोलनों से जुड़े रहने के कारण स्वतंत्र पत्रकार के रुप में कार्य करने वाले श्रीकांत ने वर्ष 1977 में अपने कैरियर की शुरूआत कहानी लेख़न से की थी। वर्ष 1980 से जनमत से इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत की। वर्ष 1986 से लेकर आज तक ये दैनिक हिंदुस्तान से जुड़े हैं।

Wednesday, January 28, 2009

जननायक की आंख़ों में आंसू

दिनांक 24 जनवरी 2009, स्थल- एक सामाजिक न्याय की धारा को मजबूत करने वाले दल के मजबूत विधायक का आवास। लगन के दिनों मे यह आवास जनमासे की शक्ल ले लेता है और उन दिनों युं लगता है जैसे यह विस्तृत आवास एक महत्वपूर्ण विवाह केंद्र बन गया है। ख़ैर आज कोई लगन का दिन नहीं है फ़िर भी कनात लगे हैं और लोगों की भीड़ लगी है। झंडा ढोने वाले लोग हाथों में झंडा लेकर दल के प्रमुख़ नेता की जय-जयकार लगा रहे हैं। दल के पहरुये महंगी गाड़ियों से उतर रहे हैं और उनके पीछे उनके ध्वज वाहकों की भीड़ पहले तो दल के मुख़िया की जयकारा और बाद में जननायक अमर रहे का नारा बुलंद कर रहे हैं। बीच-बीच में पहरुओं का भी जयकारा सुनाई दे जाता है।
सड़क के दोनों तरफ़ बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि आज यहां उस व्यकित को याद किया जायेगा जिसने सामाजिक न्याय की धारा को बिहार में मज्बूत किया था। अपने महान पिता की याद में एक महान पुत्र जो सुशासन सरकार में जनता को सुचना देने वाले विभाग के मुख़िया हैं, का लिख़ा श्रद्धांजलि पत्र पटना से प्रकाशित होने वाले सभी प्रमुख़ समाचार पत्रों में छपा है। अब कारण चाहे जो भी हो उन्होंने अपने पिता को बड़ी शान से कई नेताओं का सम्मिश्रण बताया है। यदि जननायक आज जीवित होते तो अपने पुत्र के मेधा पर फ़ूले न समाते। ख़ैर अब लौटकर उसी स्थल पर पहुंचते हैं जहां जननायक को श्राद्धांजलि दी जा रही है।
दल के सुप्रीमो से लेकर आम कार्यकर्ता तक शामिल है इस विशेष सभा में। सांसद अपनी टिकट बचाने की आस लिये, विधायक अपनी सांसदगिरी सुनिश्चित करने की जुगत में और कार्यकर्ताओं के हाथों में कागज का ढड्ढर जिसमें स्वजनों के लिये नौकरी का आवेदन एवं ट्रांसफ़र का निवेदन शामिल है। सभी जमे हैं। सभी आने की आस देख़ रहे हैं।
बहरहाल दल के मुख़िया समेत कई प्रबुद्ध लोगों का आगमन हो चुका है, लोगो में नया जोश भर चुका है। लोग भागे चले जा रहे हैं अपने नेता की आगवानी के लिये। कोई बड़ा माला कोई छोटा माला लिये ख़ड़े हैं। जो कद-काठी से मजबूत हैं वे आगे तक जा पहुंचे है और जो मजबूर हैं वे पीछे ही ख़ड़े हैं।
श्राद्धांजलि कार्यक्रम की शुरुआत की जा रही है और लोग भाषण दे रहे हैं। कोई जननायक को याद कर रहा है तो कोई सुप्रीमो की महिमा का बख़ान कर रहा है और कोई अपने मन की भड़ास निकाल रहा है। सामने रख़ी तस्वीर में कर्पुरी जी गंभीरता से सोच रहे हैं। सामने पड़े एक फ़ूल पर कुछ बुंदे पड़ी हैं। मुझे अहसास हुआ ये ओस की बुंदें है मगर मेरे मन ने कहा ये जननायक की आंख़ों से गिरे हैं।

नवल किशोर कुमार
फ़ुलवारी शरीफ़, पटना