
बिहार के विकास के लिये बिहार को समझना आवश्यक
दोस्तों, अपना बिहार आपके समक्ष उस बिहार को प्रस्तुत करने का प्रयास करता है, जैसा वह वास्तव में है। ऐसा करने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इसके सभी पाठक बिहार के अपने लोग हैं और यदि अपनों से ही अपनी कमियां और कम्जोरियां साझा न की जायें तो निश्चित तौर पर विकास की दिशा में पहल करना संभव नहीं होगा।
आजादी के 6 दशक बीतने के बाद जहां कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, तामिलनाडु और आंध्र प्रदेश आदि राज्य विकास पथ पर छलांगें मार रहे हैं, वही हमारा अपना बिहार विकलांग की भांति टुकुर-टुकुर देखने को मजबूर है। झारख़ंड के अलग होने के बहुधा यह कहते थे कि बिहार में अब लालू, बालू और आलू के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है। परंतु मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कृपा से बिहार आज अपने पांव पर खड़ा दिख रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह कि बिहार का योजना आकार बढकर 24000 करोड़ रुपये का हो गया है। इस लिहाज से बिहार अब विकलांग नहीं है और छलांग लगाने को तैयार है। बिहार को औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में शामिल किये जाने की आवश्यकता है। इसलिये यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार को विशेष सहायता दिये जाने की आवशय्कता है।
परंतु, जिस तरह से भाजपा और जदयू के नेताओं द्वारा बिहार दिवस के मौके पर विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग की जा रही है और जनमत बनाने की कोशिश की जा रही है, वह फ़ौरी तौर पर राजनीतिक स्टंट प्रतीत होता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि बिहार में विपक्ष तो रहा नहीं और जो बचा-खुचा विपक्ष है, वह भी भारी जनमत को देखते हुए सच से मुंह चुराने की कोशिश करने में लगा है। जबकि वास्तविकता यह है कि विशेष राज्य का दर्जा का मतलब क्या है, इसकी जानकारी बिहार के अधिकांश नेताओं को भी नहीं है। इस संबंध में हमने एक दर्जन विधायकों का साक्षात्कार किया। अपने साक्षात्कार के दौरान हमने विधायकों से जानने की कोशिश की। आपको जानकर हैरानी होगी कि अधिकांश विधायक बताते हैं कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से बिहार के औद्योगिकीकरण को नई गति मिलेगी। हांलाकि जब इनसे हमने पूछा कि आखिर वे कौन सी शर्ते हैं जिसके आधार पर किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिल सकता है, तब अधिकांश विधायकों ने इस सवाल का उत्तर बाद में देने की बात कही।
अभी बिहार सरकार “विशेष राज्य का दर्जा” को लेकर हाय तौबा मचा रही है। बिहारी होने के नाते मुझे भी लगता है कि बिहार को यह सम्मान मिलना चाहिये। जैसा कि सरकार कह रही है कि इससे बिहार में उद्योगों का जाल बिछ जायेगा, चहुंओर विकास होगा। शायद ही कोई बिहारी होगा जो बिहार की सफ़लता और समृद्धि का पक्षधर नहीं होगा।
इससे भी अधिक खुशी की बात यह है कि बिहार के सभी तमाम नेता इस मुद्दे पर एकजूट हैं। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले, यह मुद्दा कोई नया मुद्दा नहीं है। इस मुद्दे का लाभ जदयू और भाजपा को लोकसभा चुनाव के दौरान भी मिला और इसका आंशिक असर विधानसभा चुनाव के दौरान भी मिला। लेकिन बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने का मुद्दा अब केवल राजनीतिक नहीं रह गया है। आम जनता भी अब धीरे-धीरे इस मुद्दे को समझने का प्रयास करने लगी है। निश्चत तौर पर यह एक सकारात्मक परिवर्तन है और इसका स्वागत किया जाना चाहिये।
लेकिन एक सच्चाई है जिसके बारे में नीतीश कुमार एंड कंपनी आम जनता को बताने से हिचक रही है। कभी-कभी तो लगता है कि बड़बोलेपन के शिकार नीतीश कुमार स्वयं भी अनपढ और गंवार हैं। इसके अनेक प्रमाण हैं, लेकिन फ़िलहाल हम चर्चा केवल विशेष राज्य की करते हैं। भारत के जिन राज्यों को अबतक यह दर्जा मिला है, उसमें आसाम, मेघालय, नागालैंड, उत्ताराखंड आदि राज्य शामिल हैं। इन राज्यों की भौगोलिक स्थिति और बिहार की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। असल में भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जहां सभी राज्यों को विकास के समान अवसर प्रदान किये जाने चाहिये।
भले ही इस सच्चाई को बताने की हिम्मत नीतीश कुमार में नहीं है कि आखिर किन शर्त्तों के आधार पर किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाता है? वास्तविकता यह है कि यदि केंद्र सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना भी चाहे तो उसे कम से कम दो अहम कार्रवाईयां करनी होंगी। पहला तो यह कि वी एन ग़ाडग़िल फ़ार्मूले में संशोधन करना होगा और फ़िर संविधान में विशेष राज्य के प्रावधानों को संशोधित करना होगा ताकि उन प्रावधानों में बिहार जैसे पिछड़े राज्य को शामिल किया जा सके।
लेकिन अगर ऐसा होता है तो देश में एक नया महाभारत शुरु हो जायेगा। बिहार के अखबारों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे इस सच को छाप सकें कि बिहार अकेला नहीं है जो इस समय विशेष राज्य के दरजे की मांग कर रहा है। उड़ीसा में तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने अपने ही कार्यकाल के समय में ही इसकी मांग की थी। आज पूरे उड़ीसा में यह एक आंदोलन बन चुका है जिसका लाभी वहां के वर्तमान मुख्य्मंत्री सह स्व बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक को मिल रहा है। इसके अलावे पश्चिम बंगाल , झारखंड और उत्तरप्रदेश में भी विशेष राज्य के दर्जे की मांग होती रही है।
अब यदि सच्चाई की बात करें तो नीतीश कुमार का दोमुंहापन जनता के सामने आ रहा है। जब बिहार का विभाजन हुआ था तब तत्कालीन राजद सरकार ने केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज और विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी, लेकिन उस समय केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल रहे नीतीश कुमार एंड कंपनी ने कभी भी तत्कालीन राज्य सरकार के मांग पर ध्यान नहीं दिया और न ही कोई पहल की।
पाठकों को बताते चलें कि बिहार को दो ऐसे मुख्यमंत्री मिले हैं, जिन्होंने केंद्र को दो टूक जवाब देने की हिम्मत दिखायी। पहले थे के बी सहाय, जिन्होंने 1967 में अकाल के समय केंद्र को चेतावनी दी थी कि यदि एक भी बिहारी भूख से मर गया तो बिहार से चुटकी खनिज भी बाहर नहीं जायेगा। दूसरे मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव, जिन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि बिहार को रायल्टी नहीं, हिस्सेदारी मिलनी चाहिये, वर्ना बिहार से खनिजों को ले जाने पर रोक लगा दिया जायेगा। क्या आज इस प्रकार का हिम्मत है बिहार के किसी भी नेता के पास। एक छोटा सा उदाहरण ही देख लें। बिहार में साख जमा अनुपात 32 फ़ीसदी के आसपास है। हर साल बिहार राज्य स्तरीय बैंकर्स कमेटी की बैठक होती है और हर बार उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी बैंकों पर कार्रवाई करने की धमकी देते हैं। लेकिन हर बार यह धमकी मात्र गीदड़भभकी ही साबित होती है।
मेरी स्पष्ट मान्यता है कि बिहार विशेष राज्य के दर्जे का हकदार नहीं है। चुंकि यह दर्जा गरीब राज्यों को मिलता है। अब जिस राज्य का पंचायत का मुखिया भी 10 लाख की गाड़ी से चलता हो, आधे से अधिक विधायक करोड़पति हों और जहां के मंत्रियों की कमाई सलाना करोड़ों रुपये हो, वह राज्य यदि स्वयं को गरीब कहता हो तो बात पचती नहीं है। बिहार में असीम संभावनायें हैं। एक संभावना का जिक्र देना चाहता हूं। बिहार में 50 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने का सामर्थ्य है। यदि नेपाल सरकार के साथ मिलकर प्रयास शुरु किए जायें तो निश्चित तौर पर बिहार को न केवल बाढ और सुखाड़ से मुक्ति मिल सकेगी, वरन बिहार को बिज्ली भी मिलेगी। लेकिन नीतीश कुमार को तो राजनीति करनी है, प्रभात खबर के समूह सम्पादक को जदयू के टिकट पर राज्यसभा की सदस्यता चाहिये, तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। इसलिये विशेष राज्य का दर्जा की नौटंकी चल रही है
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